
देहरादून/विकासनगर। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर वही सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर मुन्ना सिंह चौहान को मंत्री पद से दूर क्यों रखा जा रहा है। इस बार भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार में भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक और खजान दास जैसे विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह दी, लेकिन लंबे राजनीतिक अनुभव, मजबूत जनाधार और सदन में प्रभावशाली उपस्थिति रखने वाले मुन्ना रही है जो केवल अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि सरकार और संगठन दोनों के लिए उपयोगी माने जाते हैं। विधानसभा में उनकी सक्रियता, मुद्दों पर पकड़, सरकार को असहज परिस्थितियों में संभालने की क्षमता और जन सरोकारों पर मुखर भूमिका ने उन्हें हमेशा गंभीर नेताओं की श्रेणी में रखा है। यही वजह रही कि हर बार मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा में उनका नाम प्रमुख दावेदारों में शामिल रहा, लेकिन अंतिम सूची आते-आते उनका नाम फिर गायब हो गया।
इस बार का मंत्रिमंडल विस्तार इसलिए भी ज्यादा चर्चा में है क्योंकि भाजपा ने अलग-अलग क्षेत्रों और चेहरों को प्रतिनिधित्व देते हुए भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक और खजान दास को जगह दी। इन सभी नेताओं का अपना राजनीतिक महत्व है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या मुन्ना सिंह चौहान का अनुभव, उनकी वरिष्ठता और उनकी राजनीतिक उपयोगिता इन सबसे कम थी? यही वह बिंदु है जो अब भाजपा की आंतरिक प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मुन्ना सिंह चौहान उन नेताओं में रहे हैं जिन्होंने केवल पार्टी लाइन पर चलने का काम नहीं किया, बल्कि जरूरत पड़ने पर जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाया। कई बार वे सरकार के लिए संकटमोचक बने, तो कई मौकों पर जनहित के सवालों पर उन्होंने सरकार को आईना दिखाने का भी काम किया। यही कारण है कि उनके समर्थक ही नहीं, बल्कि कई राजनीतिक पर्यवेक्षक भी मानते हैं कि ऐसा विधायक यदि कैबिनेट में होता, तो सरकार को अनुभव और संतुलन दोनों मिलते।
पछवादून क्षेत्र के संदर्भ में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। कांग्रेस शासनकाल में पछवादून से दो-दो कैबिनेट मंत्री बनाए गए, लेकिन भाजपा के इतने लंबे शासनकाल में अब तक इस क्षेत्र से एक भी विधायक को कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं मिल पाया। यह सिर्फ एक व्यक्ति की उपेक्षा का मामला नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। विकासनगर और पछवादून के लोगों के बीच यह भावना लगातार मजबूत हुई है कि उनके क्षेत्र की राजनीतिक हिस्सेदारी को वह सम्मान नहीं मिल रहा जिसकी अपेक्षा की जाती रही है।
मुन्ना सिंह चौहान की दावेदारी इसलिए भी मजबूत मानी जाती रही है क्योंकि उनका राजनीतिक करियर लंबा और विविध अनुभवों से भरा रहा है। वे सिर्फ चुनाव जीतने वाले नेता नहीं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों को समझने और सत्ता-संगठन के बीच संतुलन बनाने वाले जनप्रतिनिधि के तौर पर देखे जाते हैं। विधानसभा सत्र के दौरान भी कई मंत्री और सत्ता पक्ष के सदस्य उनके अनुभव और विधायी समझ की प्रशंसा कर चुके हैं। ऐसे में जब मंत्रिमंडल विस्तार में उनसे जूनियर या दूसरे समीकरणों वाले नेताओं को मौका मिलता है और मुन्ना सिंह चौहान फिर बाहर रह जाते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि भाजपा के फैसलों को केवल व्यक्तिगत योग्यता के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। पार्टी अक्सर क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण, संगठनात्मक प्राथमिकता, केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति और तत्कालीन राजनीतिक संदेश को ध्यान में रखकर मंत्रिमंडल का गठन करती है। संभव है कि इस बार भी यही कारण रहे हों। लेकिन यह तर्क भी अब कमजोर पड़ने लगता है, जब किसी नेता का नाम हर बार चर्चा में आए, हर बार उसे मजबूत दावेदार माना जाए और हर बार अंतिम क्षणों में वह बाहर कर दिया जाए। तब मामला केवल रणनीति का नहीं, बल्कि प्राथमिकता का भी बन जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ किया है कि भाजपा ने इस बार मंत्रिमंडल विस्तार में नए और पुराने चेहरों का मिश्रण तैयार किया, लेकिन मुन्ना सिंह चौहान को उसमें शामिल न करना एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। यह संदेश क्या है, इस पर अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं। कुछ लोग इसे पार्टी के भीतर की खेमेबंदी से जोड़कर देखते हैं, कुछ इसे क्षेत्रीय समीकरणों का असर मानते हैं, तो कुछ इसे शीर्ष नेतृत्व की अलग राजनीतिक सोच बताते हैं। लेकिन एक बात तय है कि मुन्ना सिंह चौहान का मंत्री पद से लगातार बाहर रहना अब सामान्य राजनीतिक घटना नहीं रह गई, बल्कि यह भाजपा के अंदरूनी शक्ति संतुलन की कहानी भी बयान करता है।
राजनीतिक समीक्षा के स्तर पर देखा जाए तो मुन्ना सिंह चौहान को मंत्रिमंडल में जगह मिलती, तो यह केवल एक विधायक का सम्मान नहीं होता, बल्कि पछवादून क्षेत्र के लिए एक मजबूत राजनीतिक संदेश भी होता। विकास कार्यों को गति देने, क्षेत्रीय अपेक्षाओं को संतुलित करने और अनुभवी नेतृत्व को सरकार में शामिल करने के लिहाज से यह फैसला भाजपा के लिए लाभकारी हो सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नतीजा यह है कि अब मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मुन्ना सिंह चौहान की अनदेखी का मुद्दा और तीखे रूप में सामने आ गया है।
कुल मिलाकर भाजपा ने भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक और खजान दास को मंत्रिमंडल में जगह देकर अपने राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश की है, लेकिन इसके साथ ही मुन्ना सिंह चौहान को बाहर रखकर उसने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है। आखिर इतने लंबे अनुभव, मजबूत सियासी पकड़ और जनप्रतिनिधित्व वाले नेता को कब तक इंतजार कराया जाएगा? यह सवाल अब केवल मुन्ना सिंह चौहान के समर्थकों का नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों का है जो मानते हैं कि अनुभव और जनाधार वाले नेता को सत्ता में उचित स्थान मिलना चाहिए।
…..वरिष्ठ पत्रकार मुकेश जुयाल की कलम से

