
बरसाती मौसम में पंचायत चुनाव कराना जनहित में नहीं: उठने लगे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रस्तावित पंचायत चुनावों की समयसीमा को लेकर प्रदेश में एक नई बहस छिड़ गई है। राज्य सरकार द्वारा बरसात के मौसम में पंचायत चुनाव कराए जाने के फैसले पर जनता, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं।
प्रदेश में जुलाई से सितंबर तक का समय मुख्यतः बरसाती मौसम का होता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘हाड़-तोड़ मानसून’ कहा जाता है। इस दौरान जहाँ एक ओर किसान धान की रोपाई जैसे महत्वपूर्ण कृषि कार्यों में व्यस्त रहते हैं, वहीं दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार भारी बारिश के चलते सड़क मार्ग बाधित हो जाते हैं। कई इलाकों का संपर्क मुख्य मार्गों से कट जाता है जिससे चुनावी प्रक्रिया — खासतौर से प्रचार, नामांकन और मतदान — गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।
पहाड़ी जिलों में अक्सर इस समय बादल फटने की घटनाएं सामने आती हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है। इस संवेदनशील मौसम में चुनाव कराना न केवल जोखिमपूर्ण है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतांत्रिक भागीदारी को भी बाधित कर सकता है।
विपक्षी दलों और विभिन्न जन संगठनों ने भी इस मुद्दे पर सरकार से पुनर्विचार की मांग की है। उनका कहना है कि बरसात में चुनाव कराना जनता के हित में नहीं है और इससे चुनावी प्रक्रियाएं बाधित हो सकती हैं।
सूत्रों के अनुसार मामला वर्तमान में माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। जनमानस की अपेक्षा है कि न्यायालय न केवल चुनाव की संवैधानिक वैधता पर निर्णय देगा, बल्कि चुनाव की समयसीमा को लेकर भी व्यावहारिक पहलुओं का संज्ञान लेगा।
राज्य सरकार को चाहिए कि वह मौसम और जन-सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए चुनाव की तिथि तय करे, जिससे पंचायत चुनाव निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप संपन्न हो सकें।




