


देहरादून । UPCL Tariff Hike : उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड कानूनी मोर्चे पर एक बार फिर पस्त हो गया है। गैस पावर सप्लाई करने वाली कंपनी गामा इंफ्रा के खिलाफ जारी लंबी लड़ाई में यूपीसीएल को करारी शिकस्त मिली है। इस हार के बाद बिजली महकमे के ऊपर सीधे 229 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार आ गिरा है।
महकमे पर गिरे इस 229 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बोझ की सीधी मार राज्य के आम नागरिकों पर पड़ने जा रही है। कॉरपोरेशन इस पूरी रकम की भरपाई बिजली दरों में बढ़ोतरी करके आम जनता से ही करेगा।
आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड के करीब 30 लाख बिजली उपभोक्ता इस फैसले से प्रभावित होने वाले हैं। औसतन हिसाब निकाला जाए तो राज्य के हर एक घरेलू व कमर्शियल उपभोक्ता की जेब पर करीब 763 रुपये का अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ेगा।
विद्युत नियामक आयोग ने साल 2017 में गामा इंफ्रा की पहली यूनिट के लिए 388.96 करोड़ रुपये की कैपिटल कॉस्ट मंजूर की थी। उस वक्त आयोग ने निर्माण कार्य के दौरान लगने वाले ब्याज और प्री-ऑपरेटिव खर्चों को सिरे से खारिज कर दिया था।
गामा इंफ्रा कंपनी इस फैसले को स्वीकार करने के बजाय केंद्र की अपीलीय अदालत अपटेल चली गई। अपटेल ने मामले को ध्यान से सुनने के बाद राज्य नियामक आयोग को निर्देश दिए कि रोके गए खर्चों और अतिरिक्त लागत का नए सिरे से पुनर्मूल्यांकन किया जाए।
अपटेल के कड़े रुख के बाद विद्युत नियामक आयोग ने पूरे मामले की दोबारा सुनवाई की। सुनवाई के बाद परियोजना की कुल स्वीकृत लागत को बढ़ाकर 492.03 करोड़ रुपये तय कर दिया गया।
लागत का यह नया आंकड़ा सामने आते ही यूपीसीएल के खाते में सीधे 229 करोड़ रुपये का घाटा जुड़ गया। इस तगड़े झटके से बचने के लिए यूपीसीएल ने फौरन आयोग के सामने एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की।
आयोग के अध्यक्ष एमएल प्रसाद, सदस्य प्रभात डिमरी और सदस्य अनुराग शर्मा की बेंच ने बुधवार को इस पुनर्विचार याचिका पर अपना अंतिम फैसला सुना दिया। बेंच ने यूपीसीएल की दलीलों को खारिज करते हुए याचिका रद्द कर दी और 229 करोड़ रुपये के झटके पर अंतिम मुहर लगा दी।
बिजली नियामक आयोग की तरफ से आए हालिया फैसले उपभोक्ताओं की कमर तोड़ रहे हैं। ग्रीन्को बुद्धिल मामले में भी यूपीसीएल को संबंधित कंपनी को 500 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करना तय हुआ है।
बात यहीं खत्म नहीं होती। हिम ऊर्जा प्रकरण में भी कॉरपोरेशन को लगभग 250 करोड़ रुपये चुकाने का आदेश है।
पावर डेवलपमेंट फंड की श्रेणी में यूजेवीएनएल का भी यूपीसीएल पर 556 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया चढ़ चुका है। इन तमाम मुकदमों और बकायों का बिल आखिरकार किश्तों के रूप में आम उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में जोड़कर वसूला जा रहा है।
एक तरफ अदालती झटके लग रहे हैं तो दूसरी तरफ कॉरपोरेशन के भीतर फील्ड अधिकारियों की मनमानी चरम पर है। फील्ड में तैनात अफसरों ने मुख्यालय से जारी आदेशों को ताक पर रख दिया है।
कर्मचारियों और अधीनस्थों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर का ब्योरा दो दिनों में भेजने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। 15 दिन का वक्त बीत जाने के बाद भी जब फील्ड से रिपोर्ट नहीं आई तो मुख्यालय का पारा चढ़ गया।
मानव संसाधन विभाग के अधिशासी निदेशक आरजे मलिक ने कर्मचारियों के लटके हुए प्रमोशन निपटाने के लिए ये सख्त निर्देश जारी किए थे। यूपीसीएल के प्रबंध निदेशक ने हर हाल में 31 जुलाई तक पदोन्नति की पूरी कवायद खत्म करने की डेडलाइन सेट कर रखी है।
मुख्यालय ने बुधवार को एक बार फिर कड़ा पत्र जारी करते हुए साफ कर दिया है कि अगर एसीआर न मिलने की वजह से किसी भी कर्मचारी की पदोन्नति रुकती है तो उसकी सीधी जिम्मेदारी संबंधित फील्ड अफसर की होगी। लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी और उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
यूपीसीएल के एमडी पीसी ध्यानी ने इस पूरे प्रशासनिक विवाद पर रुख साफ किया है। उनका कहना है कि कॉरपोरेशन में खाली पड़े पदों पर योग्य कर्मचारियों की पदोन्नति तय समयसीमा के भीतर ही पूरी की जाएगी।
मानव संसाधन अनुभाग को इस संबंध में स्पष्ट हिदायत दी जा चुकी है। कर्मचारियों के प्रमोशन, एसीपी और सेवा से जुड़े बाकी तमाम लंबित मसलों का समय पर निस्तारण किया जाएगा।

